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बीजेपी द्वारा डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की उपेक्षा

सोशल मीडिया में यह समाचार आ रहा है की डॉ. स्वामी दिल्ली की किसी सीट से अपनी उम्मीदवारी चाहते थे. केन्द्रीय चुनाव समिति में उनके नाम की चर्चा की गयी.नरेंद्र मोदी और नितिन  गडकरी उन्हें दिल्ली से ही चुनाव लड़ाने के पक्ष में थे. प्रायः सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने इसका विरोध किया. यह भी चर्चे हैं की आडवानिजी और  राजनाथ सिंह इस चर्चा/विवाद में तटस्थ रहे. यह कोई आधिकारिक समाचार नहीं है. अन्दर से छन कर आई बातों के आधार पर सोशल मीडिया में इसके चर्चे हो रहे हैं. फेसबुक पर राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं में गहरा रोष है. इन सभी नेताओं को लगातार ट्वीट और मेसेज से क्षोभ/विरोध प्रेषित किये जा रहे हैं. अपने फेसबुक वाल पर मुझे इस आशय के बहुत सारे पोस्ट आये हैं. मैं भी इससे दुखी और विचलित हूँ.

डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी हाल तक अपनी अलग पार्टी में थे. कुछ ही दिन पहले उन्होंने बीजेपी की विधिवत सदस्यता ली है.इस दृष्टि से वे बीजेपी के नए सदस्य माने जा सकते हैं. परन्तु प्रश्न यह है की क्या  ऐसे नए सदस्यों को बीजेपी इच्छित क्षेत्रों से टिकट नहीं दे रही है ? नाम गिनाया जाय तो अभी तक जारी सूची में बहुतेरे ऐसे नाम मिल जायेंगे. दूसरा प्रश्न है की क्या नए सदस्यों की योग्यता किस आधार पर तय होती है ? सिर्फ चुनाव जीतने की क्षमता और/या उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि और/या उनकी  व्यक्तिगत छवि ? मुझे लग रहा है की अधिकतर नए सदस्य जिन्हें चुनाव के लिए स्वीकृत किया गया है वे सामान्यतः चुनाव जीतने की क्षमता की कसौटी पर तौले गए हैं. कुछ सदस्यों के सन्दर्भ में जीत की सम्भावना और अच्छी छवि, दोनों मानक मौजूद हैं. संभवतः डॉ. स्वामी एकमात्र ऐसे ‘नए’ सदस्य हैं जो इन दोनों के अतिरिक्त प्रखर राष्ट्रवाद की  कसौटी पर भी खरे उतारते हैं.दिल्ली की किसी सीट से उनके जीतने की क्षमता में कोई शक नहीं है, उनकी व्यक्तिगत छवि बेदाग़ है, और वैचारिक रूप से भी वे बीजेपी की हिंदूवादी/राष्ट्रवादी सोच का मुखर रूप से पोषण करते हैं.

एक अतिरिक्त आधार उनके चयन के लिए यह है, और यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, की यु.पि.ए. सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध उन्होंने न्यायपालिका में अहर्निश संघर्ष करते हुए उनके घोटालों की जांच करवाई है. और वे लगातार इसमें सक्रिय हैं. मुझे तो लगता है की अगर डॉ. स्वामी का प्रयास नहीं होता तो कांग्रेस सरकार भ्रष्टाचार के केस में इतना नंगी नहीं हुई होती. जो काम  विपक्षी पार्टी होने के  नाते बीजेपी को करना चाहिए था वह काम इन्होने ही किया.बीजेपी इस फ्रंट पर अपनी जिम्मेवारी का निर्वाह लेश-भर नहीं कर सकी. कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के विषय पर बीजेपी के प्रखर विरोध की कमी भी एक रहस्य है जिस पर अलग से चर्चा की जरूरत है.ऐसा नहीं है की बीजेपी आक्रामक विरोध के लिए सक्षम नहीं थी. बीजेपी के पास इस सन्दर्भ में उचित नीति कभी नहीं थी. क्यों नहीं थी, यह एक रहस्य है.डॉ. स्वामी द्वारा सुप्रीम कोर्ट से जांच करवा कर कांग्रेस को एक्सपोज किये जाने का सीधा लाभ बीजेपी को ही मिला. नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में इसका समुचित प्रयोग कर रहे हैं.इन सारी  बातों की पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट दीखता है की डॉ. स्वामी को बीजेपी में प्रमुखता या समुचित आदर का स्थान नहीं देने में व्यक्तिगत स्वार्थ-आधारित किसी सोच का ही षड्यंत्र है.

बीजेपी के कुछ शीर्ष नेताओं में इस तरह की स्वार्थ-केन्द्रित भावना अत्यंत दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है. बीजेपी एक राष्ट्रवादी राजनीतिक सगठन है. यह राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के विचारों और आदर्शों पर आधारित है. संघ के दर्शन से ही मोदीजी ने ‘राष्ट्र प्रथम’ का उद्घोष लिया है. इस संगठन में शीर्ष पर ऐसी सोच हो जो राष्ट्र-हित से ज्यादा स्व-हित को महत्व देता है तो यह इस संगठन की वैचारिक विपन्नता है. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को व्यक्ति/कार्यकर्ता और राष्ट्र के बीच के पारस्परिक सम्बन्ध और महत्व को समझना होगा. अगर संगठन के नीति-निर्धारक सदस्य राष्ट्रवादी दृष्टि में कमजोर होंगे तो हमारे संगठन की वैचारिक लड़ाई तो हम पहले ही हार जायेंगे. डॉ. स्वामी के सन्दर्भ में अगर सच-मुच वर्णित परिस्थितियों में निर्णय प्रभावित हुआ है तो बीजेपी को तुरत सुधर करना होगा. बीजेपी को यह भी स्पष्ट रूप से समझना चाहिए की वह सांगठनिक रूप से अकेले चुनाव लड़ कर जीतने में सक्षम नहीं है. इसकी सफलता में सैकड़ों राष्ट्रवादी संगठनों का जमीनी सहयोग जुड़ा होता है. उनकी भावना का भी बीजेपी आदर करे.बीजेपी सांगठनिक रूप से स्वयं को स्वच्छंद समझने की कोशिश नहीं करे, अन्यथा उनका अकेले का अथक संघर्ष  उन्हें कभी सफलता नहीं दिला सकेगा.

वन्दे मातरम.

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