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२०१४ :: भारत का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम

स्वात्यान्त्रोत्तर भारत के ६५ वर्ष ब्रिटेन के उपनिवेशवादी शासन का  देसी संस्करण रहा है. जवाहरलाल नेहरु ने यूरोपीय सांस्कृतिक विध्वन्स्वाद की परंपरा का निर्वाह किया. नेहरू का नव-सेकुलरवाद हिन्दू-विरोध की नीव पर खड़ा हुआ. नेहरू जी के  बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, नरसिंह राव, और अब श्रीमती सोनिया गाँधी के संरक्षण में डॉ मनमोहन सिंह ने नेहरु के नव-सेकुलरवाद को घोषित रूप से मुस्लिम-इसाई तुष्टिकरण के रूप में परिभाषित किया. बीच के दौर में मोरारजी देसाईं  और विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधान-मंत्री के रूप में इसी सेकुलरवाद को आगे बढ़ाया. अटल बिहारी बाजपाई की सरकार स्वतंत्र नहीं थी. उसे अन्य दलों के सहयोग की अपेक्षा थी जो इस सेकुलरवाद का विरोध नहीं चाहते थे, इस लिए वे भी इस धारा को मोड़ नहीं पाए. आज यह सेकुलरवाद पूरी तरह से राष्ट्रवाद के खिलाफ दैत्य की तरह मुँह बाए खड़ा है. प्रारंभ में तो यह सेकुलरवाद सिर्फ भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरुद्ध था. परन्तु आभी के दौड़ में यह पूरी तरह से देश की आर्थिक, भौगोलिक और सामजिक हितों के विरुद्ध खड़ा है. इस सेकुलरवाद की पृष्ठभूमि में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, अमेरिकी साम्राज्यवाद और ग्लोबल mercantilism ( बहु-राष्ट्रीय कम्पनी) सक्रीय रूप से समाहित हो गये  है. भारतीय एन. गी. ओ. के माध्यम देश को विखंडित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय फण्ड देश में आ रहे हैं. देश की राजनीति में इन संस्थाओं के माध्यम से अमेरिकी और यूरोपीय हस्तक्षेप स्पष्ट दीखने लगा है. एक समय था जब अमेरिका अपने धन-बल से भारत के कुछ सांसदों को अपने पक्ष में रखते थे. परंतु अब साज़िश इतनी बड़ी और गहरी हो गयी है की अमेरिका अपने धन-बल के माध्यम  भारत देश में अपना प्रधान मंत्री नियुक्त कर लेने का मंसूबा पाल रहा है. यूरोप और अमेरिका भारत को सशक्त राष्ट्र नहीं देखना चाहते हैं. विश्व के पूर्वी भाग में रूस को कमजोर करने के बाद अब अमेरिका के एजेंडा में चीन और भारत हैं. पूरा विश्व यह जानता है की भारत देश से भावनात्मक रूप से अधिकतर हिन्दू ही जुड़े हुए हैं. इसलिए ये षड्यंत्रकारी विदेशी शक्तियां हिन्दुओं को अपमानित और विखंडित कर उनका मनोबल गिराना चाहती हैं. इस्लामी आतंकवाद और इसाई मिशनरी धर्मांतरण का मिला-जुला आक्रमण हिन्दू संस्कृति पर इसी लिए लगातार ही रहे हैं. नरेंद्र मोदी का विरोध पूरी तरह से विदेशी षड्यंत्र के अंतर्गत ही भारत में तैयार किये गए  संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा किया जा  रहा है. अरविन्द केजरीवाल इसी अमेरिकी षड्यंत्र की उपज प्रतीत होते हैं. मदर टेरेसा की ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ से शुरू हो कर ‘मग्सायसाय अवार्ड’ और फोर्ड,आवाज़,रोक्क्फेलर आदि से पोषित एन,गी.ओ. का सफ़र तय करते आज भ्रष्ट कांग्रेस की गोद में पलते हुए केजरीवाल जी द्वारा  नरेंद्र मोदी की राह रोकने का एलान — इसी अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र की ओर इंगित करता है. २०१४ के लोक-सभा चुनाव , विदेशी षड्यंत्र से जकड़े पवित्र भारत-भूमि को मुक्त करने का महा-समर है. देशभक्ति की इस चुनौती को हम सब मिल कर स्वीकार करें.

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